Tuesday, 29 January 2019

बारिशें

ये बारिश, बारिश की कुछ बूँदें और तुम।

मानो जैसे इन तीन शब्दों में मैंने अपना सब कुछ बयाँ कर दिया हो।

उसे बारिश में भीगना पसंद था और मुझे वो।

कैसे उसके एक फ़ोन करने पर मैं बिना कुछ सोचे समझे, भीगता हुआ उसके घर पहुंच जाया करता था।

क्योंकि उसे मुझसे बारिश में नाचते हुए अपनी तस्वीरें जो खिंचवानी होती थी।

शायद उसके घरवालों ने उसका नाम बिल्कुल सही रखा था- "मयूरी" ।

वो जैसे बारिश में अपने परों को लहराकर मोर नाचते हैं ना या वो बारिश के बाद आसमाँ में जो सात रंग दिखाई देते हैं।

ठीक वैसे ही सारी कलाएँ, सारे रंग मानो जैसे उसने खुद के अंदर बड़े ही सहज तरीके से समेट लिए हों।

लेकिन शायद उसे ये नहीं पता था कि उसने एक बेरंग इंसान की जिंदगी में इतने रंग भर दिए हैं।

कुछ अलग ही अंदाज़ था उसका रूठे हुए को झठ से मना लेती थी, रोते हुए को हँसा देती थी, अंजान लोगों को भी अपना बना लेती थी और बातों में तो वो सबकी उस्ताद थी।
चेहरे पर उसके एक अलग ही नूर था, आँखों में किसी शोर से पहले की खामोशी और लबों पर एक दिलकश कहानी थी।
जब ज़ुल्फें लहराती थी तो लगता था कोई ठंडी पुरवाई चल रही हो।
एक बार कोई उसके साथ वक़्त गुज़ारने बैठ जाए तो पता ही नहीं चलता था कि कब सुबह से शाम और कब शाम से सुबह हो गई।
कुछ ऐसी ही थी वो सबसे अलग सबसे अलहदा।

एक बार किसी शाम उसने ऐसे ही मुझसे पूछ लिया कि- 'ध्रुव!  तुम्हें पता है तुम्हारे नाम का मतलब क्या है?'

फिर कुछ सोचते हुए अपने ही अंदाज़ में आसमाँ की तरफ इशारा करते हुए बोली कि, तुम वो ध्रुव तारे हो जो आसमान में सबसे ज्यादा चमक रहा है। जिसे देखकर हर कोई उसे पाना चाहता है पर वो किसी के हाथ नहीं आता।

तब मैंने पूछा कि तुम्हारा मतलब क्या है?

तब मुझे बड़े ही प्यार से समझाते हुए बोली कि- तुम मेरी जिंदगी में उस ध्रुव तारे की तरह हो, जो अपनी रोशनी से मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाता है।

फिर मैंने हैरत से उसे देखते हुए पूछा कि- तुम्हारे नाम का क्या मायना है?

पहले तो वो बहुत खुश हुई पर फौरन ही उदास होकर बोली कि - ' मैं वो मोर हूँ जो बारिश होने पर अपने परों को लहराकर आसमान की ओर देखते हुए खुशी से नाचता है इस चाहत में की एक दिन वो आसमान जरूर छुएगा। पर फिर उसे लगता है कि वो आसमान कभी छू नहीं पाएगा और उसे छूने की ख्वाहिश में दर दर भटकता है।'

ठीक उस मोर और आसमान की तरह हम दोनों भी कभी एक नहीं हो पाएंगे।
ये कहते ही वो वहाँ से चली गई।

इतना सुनते ही मैं सुन्न हो गया। ऐसा लगा कि मैं कोई हसीन ख़्वाब देख रहा था और किसी ने मुझे बुरी तरह झकझोर दिया हो।

वहाँ बैठकर मैं खुद से ही ये कहने लगा कि- "काश! काश! काश! तुमने अपना फैसला सुनाने से पहले मुझसे एक दफ़ा अपना हाल-ए-दिल तो पूछ लिया होता। मैं तुम्हें बता पाता कि जिसे तुम अपनी जिंदगी की डायरी का महज एक पन्ना समझ रही हो। उसने तुम्हें अपनी जिंदगी की वो डायरी माना है जिसे उसका लेखक बेतहाशा मुहब्बत करता है और ताउम्र उसे अपने पास सहेजकर रखता है। और किस तरह वो उस डायरी के खाली पड़े सफेद पन्नों पर रंग बिरंगी स्याही से बेहतरीन कहानियाँ लिखता है।"

अब जब भी बारिशें आती है, अपने साथ तुम्हारी यादें भी ले आती है,
अपने दिल के मकाँ से तुम्हारे ख्याल अब निकाल देता हूँ मैं,
अक्सर अब बारिशें यूँही गुज़ार देता हूँ मैं।।

Tuesday, 8 January 2019

मैंने बड़े क़रीब से देखा है।



समँदर किनारे बैठकर,
लहरों को गुज़रते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

साहिल पर बने मिट्टी के,
घरौंदों को बिखरते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

जिंदगी के इस कारवाँ को बढ़ते हुए
और आफताब की तरह डूबते हुए
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए,
सूखे पत्तों की तरह मुरझाते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

यार तो सबके दिल फ़रियाद होते हैं,
उन जान से प्यारे यारों को झगड़ते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
                                          
                                           ~'सूफ़ी'

Travel Diaries

  Sometimes when we start a journey we don't know where it will end. Most of the time we believe it will happen according to us but some...