साहिल पर बने मिट्टी के,
घरौंदों को बिखरते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
घरौंदों को बिखरते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
जिंदगी के इस कारवाँ को बढ़ते हुए
और आफताब की तरह डूबते हुए
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
और आफताब की तरह डूबते हुए
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए,
सूखे पत्तों की तरह मुरझाते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
सूखे पत्तों की तरह मुरझाते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
यार तो सबके दिल फ़रियाद होते हैं,
उन जान से प्यारे यारों को झगड़ते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
उन जान से प्यारे यारों को झगड़ते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
~'सूफ़ी'

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