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Tuesday, 8 January 2019

मैंने बड़े क़रीब से देखा है।



समँदर किनारे बैठकर,
लहरों को गुज़रते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

साहिल पर बने मिट्टी के,
घरौंदों को बिखरते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

जिंदगी के इस कारवाँ को बढ़ते हुए
और आफताब की तरह डूबते हुए
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए,
सूखे पत्तों की तरह मुरझाते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।

यार तो सबके दिल फ़रियाद होते हैं,
उन जान से प्यारे यारों को झगड़ते हुए,
मैंने बड़े क़रीब से देखा है।।
                                          
                                           ~'सूफ़ी'

Saturday, 22 December 2018

बचपन







गूँजती थी घर के आँगन में मेरी किलकारी जो,
खो गयी है आज दुनिया की इस भीड़ में वो।
ना जाने क्यों वक़्त के साथ मैं बड़ा हो गया,
वो बचपन ना जाने अब कहाँ खो गया।

आती थी जो नींद मुझे मेरी प्यारी माँ की उस गोद में,
गायब है वो आज इस महँगे बिस्तर की मौज में।
चलना सिखाया था पापा ने मुझे उंगली पकड़ कर तब,
खड़ा हूँ उनकी वजह से आज अपने पैरों पर अब।।

टाँग कर बस्ता काँधे पर, पापा ने मुझको स्कूल पढ़ने भेजा था,
याद है मुझको वो पल तब मैं खूब रोया था।
कहाँ इल्म था मुझको की एक दिन मैं फिर ऐसे रोऊंगा,
उस प्यारी सी स्कूल से जब हमेशा के लिए मैं दूर होऊँगा।।

बचपन जो था मेरा, यादों का वो एक बक्सा था,
ना जाने क्यों वक़्त को वो अखर गया।
आये जो दिन जवानी के, बचपन शीशे सा बिखर गया,
वो बचपन ना जाने अब कहाँ खो गया।।
                             
                                                     ~ 'सूफ़ी'

Travel Diaries

  Sometimes when we start a journey we don't know where it will end. Most of the time we believe it will happen according to us but some...